जन-गण-मन की धुन किसने बनाई
स्वाधीनता दिवस पर विशेष
क्या आप जानते हैं -
पाकिस्तान को आजादी 14 अगस्त 1947 भारत से एक दिन पहले भले ही मिल गई हो लेकिन 30 सितंबर 1948 तक वहाँ भारतीय नोट ही चलते रहे इसलिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत के साथ साथ पाकिस्तान के लिए भी मुद्रा प्रबंधन का जिम्मा उठाती थी। 1947 का ऐसा ही नोट देखें जिसमें बायीं ओर गवर्नमेंट ऑफ़ पाकिस्तान भी लिखा है।
लार्ड माउंटबेटन ऐसे शख्स थे जिन्होने 14 अगस्त को कराची में पाकिस्तान की आजादी समारोह में और 15 अगस्त को नई दिल्ली में भारतीय आजादी के समारोह में शिरकत की थी। (पाक में जिन्ना और भारत में नेहरू का वीडियो देखें) वीडियो में भारतीय संसद भवन के आसमास उमड़ी जनता का उत्साह देखते ही बनता है।
राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधियानक जय हे भारत भाग्य विधाता‘ की धुन राम सिंह ठाकुर ने कम्पोज़ की थी। गीत के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर थे। यह गीत पहली बार इंडियन नेशनल कॉग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था। (कम्पोज़र राम सिंह ठाकुर के बारे में यहां पढ़े) प्रस्तुत चित्र में गांधी जी के सम्मान में ठाकुर वायलिन बजा रहे हैं।
राष्ट्रगान के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की आवाज़ में ‘जन-गण-मन’ यहां सुनें।
27 फ़रवरी 1948 को ब्रिटिश सैनिकों की आखरी टुकड़ी को मुंबई के गेट वे ऑफ़ इंडिया से विदाई दी गई। भारतीय फौज ने ब्रिटिश टुकड़ी के मेजर जनरल इन कमांडिंग एल जी हिटलर को समारोहपूर्वक विदाई दी। लगभग डेढ़ सौ बरस भारत में रहने वाले अंग्रेज़ों को दी जाने वाली यह आख़िरी विदाई थी। वीडियो देखें-
‘पाकिस्तान‘ शब्द का उल्लेख पहले-पहले ब्रिटेन मे चौधरी रहमत अली ने किया था। मुस्लिम लीग से जुड़े इस शख़्स ने ब्रिटेन में भारत के पश्चिमी हिस्से के पांच राज्यों को लेकर मुस्लिम बहुल राष्ट्र पाकिस्तान की परिकल्पना की थी। इसका उल्लेख 28 जनवरी 1933 को उनके प्रकाशित किए गए एक पर्चे “Now or Never; Are we to live or perish forever? में मिलता है।
”दुनिया सो रही है भारत जाग रहा है…”
‘Tryst with Destiny’ आज़ादी की मध्यरात्रि दिया जाने वाला पंडित नेहरू का भाषण था। इंडियन कॉस्टीट्यूएंट असेम्ब्ली में दिए गए इस भाषण में नेहरू ने देश के इतिहास की गौरवपूर्ण गाथाओं को याद करने के साथ ही आने वाले कल के आधुनिक भारत की अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की थी। यहां सुनें और वीडियो देखें।
”आज हिमालय की चोटी से दुश्मन को ललकारा है..दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दोस्तां हमारा है”- 1943 में आई अशोक कुमार की सुपरहिट फिल्म ”किस्मत” का गाना अदाकारा मुमताज शांति ने मंच से गाकर ब्रिटिश सेंसर को सकते में डाल दिया था। डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी ने चालाकी से ये तर्क दिया था कि ये गीत दूसरे विश्व युद्ध में नाजियों और जापानियों को भारतीय चुनौती है। जबकि असल में यह अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ गीतकार कवि प्रदीप का लिखा गीत था।
15 अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की ख़बर दुनिया के हर बड़े अख़बारों की सुर्खियां थीं। न्यूयॉर्क टाइम्स का अंक देखिए जिसमें इस ख़बर को सेकन्ड लीड बनाया गया। दोनों देशों का नक़्शा छपा और हेडिंग थी- “India and Pakistan become nations, clashes continue” क्लेशेस कन्टीन्यू यानी फ़साद जारी.. विभाजन की त्रासदी यही थी जिसने दोनों देशों को हिलाकर रख दिया था। इन दंगो में 13 लाख लोग मारे गए, डेढ़ करोड़ विस्थापित हुए, साढ़े बारह लाख शरणार्थी भारत में आए, एक लाख औरतों का बलात्कार हुआ और करोड़ों की लूट-पाट हुई।

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bahut behtareen jaankaari Bhai sab !!! Badhaai aur dhanyawaad …
शुक्रिया!!
नमन उन सभी जाने-अनजाने शहीदों और सेनानियों को जिनके कारण आज हम आज़ादी की साठवीं वर्षगांठ मना पा रहे हैं
Excellent. yah pahale kabhi nahin dekha, bahut keemati janakari hai. Aapake prayason ke liye dhanyawad
http://www.merapahad.com/forum/personalities-of-uttarakhand/personalities-of-uttarakhand/msg25000/#msg25000
कै० राम सिंह के बारे में कुछ जानकारी यहां भी है
शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जो भी तस्वीर बनाता हूं बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
तूने जो दर्द दिया उसकी क़सम खाता हूं
इतना ज़्यादा है कि एहसां से दबा जाता हूं
मेरी तक़दीर बता और तक़ाज़ा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
मैंने जज़्बात के संग खेलते दौलत देखी
अपनी आंखों से मोहब्बत की तिजारत देखी
ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रक्खा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है
जो भी तस्वीर बनाता हूं बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
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KRYSANNE LOL
‘Jana Gana Mana’ is the national anthem written by rabindranath tagore. He was a great man from Bengal.
अपने देश की आजादी का वीडियो और पंडित नेहरू जी को देख कार बहुत अच्छा लगा. अपने देश की स्वतंत्रा देख कर आखो मै आशू आ गये है.
जन गन मन धुन के रचियेता स्वर्गीया श्री राम सिंग ठाकुर के बारे मै जानकारी पर कर ग्यान मै बरोतेरि हुई.
आपका इस साइट के द्वारा सुंदर जानकारी देने का प्रयास बहुत सराहनिया है .
आपका बहुत बहुत धय्नय्बद,
पूरन
Jai hind Jai bharat………
add about me?
बढि़यॉं लेख है भाई जानकारी भरा
आजादी से एक दिन पहले हिन्दुस्तान अखबार एक आने का और आजादी के पहले ही दिन दो आने का हो गया. रातो-रात कागज, कलम या स्याही महंगी हुई या पत्रकार? मुझे तो लगता है कि आजादी.
है तो खेद की बात लेकिन सच है कि आज पहली बार जाना कि राष्ट्रीय गीत की धुन रामसिंह ठाकुर ने बनाई।
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld
Neeraj Bhai,
Interesting blog. A lot of raw information which is hard to digest. Thanks for sharing this with us. I will come back at a later time to discuss some of the issues .
I grew up in Bhopal….not too far from Hoshangabad.
warm regards and keep blogging.
इतनी दुर्लभ और रोचक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद। सब से रोचक मुझे वह नोट लगा, जिसे भारत सरकार ने पाकिस्तान के लिए छापा है। पाकिस्तान शब्द की व्युत्पत्ति का दस्तावेज़ भी रोचक है। पूर्व बंगाल भी पाकिस्तान बनेगा, यह कब निश्चित हुआ?
वाह! बहुत कुछ जानने, समझने को मिला.. शुक्रिया
ईष्टदेव जी,
कैप्टन राम सिंह ठाकुर कौन थे और उन्होंने जन-गण-मन की धुन कब बनाई थी। यह जानकारी आप यहां देखें.
ऊपर पोस्ट में भी लिंक दिया गया है। पूरा लेख हिन्दी में करना संभव नहीं किंतु इतना बता सकता हूं कि धुन राम सिह जी की ही बनाई हुई है। शब्द कुछ इस तरह थे – सुख चैन की बरखा बरसे भारत भाग्य विधाता..
यदि आपने श्याम बेनेगल की नेताजी फ़िल्म देखी हो तो याद आएगा कि यही शब्द उसमें भी गाए गए थे.
इसके अलावा यदि विकीपीडिया पर जाएं तो वहां भी पढ़ा जा सकता है.
यदि आपके पास दस्तावेजी प्रमाण हों तो मेरे ज्ञान में बढ़ोतरी करें। आभारी रहूंगा
आप ठीक-ठीक नहीं जानते हैं. जन-गन-मन की धुन जोर्ज पंचम ने बनाई थी. भरोसा न हो तो इतिहास पलट कर देख लें.
बहुत ही विस्तार से आपने लिखा और बहुत सारी ऐसी बातें और अखबार ,विडियो बहुत ही ज्ञानवर्धक है।
स्वतंत्रता दिवस की पावन संध्या पर शुभकामनायें !!।
Excellent. yah pahale kabhi nahin dekha, bahut keemati janakari hai. Aapake prayason ke liye dhanyawad.
बेहतरीन लेख है। इस तरह के लेख अगर ब्लॉग जगत में ज़्यादा लिखे जाने लगें, तो बात ही कुछ और हो जाएगी। इस लेख के लिए धन्यवाद।
नीरज भाई…
बहुत परिश्रमपूर्वक तैयार कर जारी की गई सामग्री के लिये ह्र्दय की गहराई से साधुवाद.श्री रामसिंह ठाकुर जन गण मन धुन के कंपोज़र हैं जानकर मन प्रसन्न हो गया. दूरदर्शन के स्वर्णिम काल (जब इन ख़ूख़ार चैनलों का अवतरण नहीं हुआ था) में एक इंटरव्यू में रामसिंह जी को देखा था वाँयलिन बजाते हुए/ गाते हुए और कभी कभी आईएनए के वृंदगान में .ट्रिब्यून में जारी मूल आलेख के अंत में लिखा है दो प्रदेश सरकारों ने उन्हे सम्मानित किया और किसी ने नौकरी भी दे दी….देखियेगा किसी दिन भारत सरकार हिमेश रेशमिया को पद्मभूषण से नवाज़ देगी…दर-असल रामसिंह जी जैसे सपूतों को सम्मानित किया जाना चाहिये..सरकारें कभी भी ऐसा नहीं कर पातीं..अफ़सोस…जय हिन्द.
मुझे नहरू जी का भाषण बेहद पसन्द है। इसकी भाषा सरल है जो किसी भी भाषण या लेख को यादगार बनाते हैं।
गज़ब सिपाही!!
बहुत ही अच्छी जानकारी!!
शुक्रिया!!
नमन उन सभी जाने-अनजाने शहीदों और सेनानियों को जिनके कारण आज हम आज़ादी की साठवीं वर्षगांठ मना पा रहे हैं
Neeraj bhai,
bahut saree aisee baaton ke bare mei pata chala jise pehle nahee jaante the — isliye, aapka bahut bahut aabhaar —
Ise SAVE kiya jayega — Thank you * & –
regards,
Lavanya
बहुत अच्छी सहेजने योग्य जानकारी एक जगह एकत्रत कर पेश करने के लिये अति आभार एवं साधुवाद.
आपको स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेरों बधाई एवं हार्दिक अभिनन्दन.
स्वतंत्रता पर्व की शुभकामनाएँ। उन शहीदों को बारंबार नमन जिनके बलिदान से हमें यह दिन देखने को मिला।