सोने की चिड़िया परदेसी पिंजरे में बंद

June 3, 2011 3 comments

कालाधन कितना?

स्वामी रामदेव के मुताबिक़ (स्वाभिमान ट्रस्ट का अध्ययन)

258 लाख करोड़ रुपए विदेश में जमा काला धन

60 लाख करोड़ रुपए देश में जमा काला धन

प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन (IIM प्रोफ़ेसर)

Global Financial Integrity Report 2006 के हवाले से

72 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपए विदेश में जमा काला धन

Global Financial Integrity Report 2010

22 लाख 50 हज़ार करोड़ रुपए विदेश में जमा कालाधन

8 लाख 18 हज़ार करोड़ रुपए देश में जमा कालाधन

प्रणब मुखर्जी (जनवरी 2011 का बयान)

18 महीनों तक कई देशों से सूचनाएं इकट्ठा करने के बाद सरकार को अब तक भारतीयों के विदेश में जमा कालेधन का पता चला है तो केवल 15 हज़ार करोड़ रुपए का. प्रणब के मुताबिक़ कालेधन को लेकर छपने वाले सारे आंकड़े अप्रमाणित हैं.

चलिए, विस्तार से बातें आगे करेंगे। अभी इतना समझ लें कि बाबा रामदेव जिस 318 (258+60) लाख करोड़ की बात कर रहे हैं- उसका मतलब क्या है। इतनी राशि भारत वापस आ जाए तो क्या से क्या हो सकता है। लोग कहते हैं भारत सोने की चिड़िया बन जाएगा।


क्या होते हैं 318 लाख करोड़ रुपए

31800000,00,00,000 रुपए

यानी 318 पर बारह शून्य लगते हैं. यानी 318 ट्रिलियन रुपए

  1. भारत पर विदेशी कर्ज़ 261 बिलियन डॉलर (रिज़र्व बैंक ने 2010 में बताया है) यानी भारत पर विदेशी कर्ज़ है – 11 हज़ार 745 करोड़ रुपए
  • हम 27 बार विदेशी कर्ज़ चुका सकते हैं
  • देश के हर नागरिक पर लगभग 1,177 रुपए का विदेशी कर्ज है चाहे वह नवजात शिशु ही क्यों न हो जबकि घरेलू कर्ज को जोड लें तो यह रकम हर भारतीय पर लगभग 29,800 रुपए हो जाएगी।
  • यानी हर भारतीय इतना पैसा वापस आने पर देसी-विदेशी कर्ज़ मुक्त हो जाएगा
  1. भारत की जीडीपी 62.1 ट्रिलियन रुपए (62.1 लाख करोड़ रुपए)
  • पांच गुना ज़्यादा शक्तिशाली हो जाएगा अपना बजट.. यानी हम हर योजना पर पांच गुना ज़्यादा खर्च कर सकते हैं.
  1. यूएस की जीडीपी 635 ट्रिलियन रुपए (635 लाख करोड़ रुपए)
  • आधा अमेरिका के बराबर
  1. भारत का रक्षा बजट 1 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपए
  • हम 300 साल का रक्षा बजट बना सकते हैं.
  1. नागार्जुन सागर जैसे 24 हज़ार 461 बांध बनाए जा सकते हैं.. देश की हर नहर, हर गांव पानी से लबालब हो सकता है
  1. दिल्ली-मुंबई-चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना में लगने वाले खर्च की 530 गुना है यह रकम
  1. 30 लाख छोटे हॉस्पिटल (10 करोड़ रुपए की लागत वाले) देशभर में बनाए जा सकते हैं.. साथ ही 30 लाख छोटे स्कूलों (10 लाख रुपए की लागत पर) को बनाया जा सकता है जिससे हमारी साक्षरता दर 65 फ़ीसद से बढ़कर काफ़ी ज़्यादा हो जाएगी
  1. ग्रामीण इलाकों में हर हाथ को काम देने की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा के लिए सालाना बजट 40 हज़ार करोड़ रुपये है.. यानी कालाधन इससे 795 गुना ज़्यादा है.
  1. वित्त वर्ष 2011-12 के लिए सर्वशिक्षा अभियान का बजट सिर्फ 21 हज़ार करोड़ रुपये है.. यानी कालाधन इससे 1514 गुना ज़्यादा है.

(सभी आंकड़े एक डॉलर= 45 रुपए में परिवर्तनीय)

स्विज़रलैंड में 6 फ़ीसद लोग केवल बैंकिंग के कारोबार में लिप्त है। दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में इतनी बड़ी तादाद में बैकिंग व्यवसायों से जुड़े लोग नहीं है। यहां तक कि स्विज़रलैण्ड की जीडीपी का लगभग 50 प्रतिशत अंश बैंकिग गतिविधियों से आता है। जो किसी भी अन्य देश से कहीं ज़्यादा है। देश की 75 लाख की आबादी में 5 लाख लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर बैंकिंग के कारोबार से जुड़े हैं। जानकारों का मानना है कि अगर भारत जैसे देशों ने यहां से अपना काला धन निकालना/निकलवाना शुरू किया तो स्विस अर्थव्यवस्था ध्वस्त भी हो सकती है। इसलिए स्विस बैंकिंग सेक्टर और स्विट्जरलैंड सरकार की कोशिश है कि तमाम कानूनी दांव-पेचों और अंतरराष्ट्रीय संधियों का हवाला देकर काले धन के इस कारोबार को बचाया जा सके।

पांच सालों में ही देश से बाहर गए 72 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपये काले धन पर अध्ययन करने वाले आईआईएम, बेंगलौर के प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन के मुताबिक, ’2002-06 के बीच भारत से हर साल करीब 1,36,466 करोड़ रुपये काले धन के रूप में देश से बाहर गए हैं।

प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन ने अपना अध्ययन Global Financial Integrity की 2006 में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर किया था। यह सारी जानकारी उन्होंने Rediff को 2009 में दी थी। http://election.rediff.com/interview/2009/mar/31/inter-swiss-black-money-can-take-india-to-the-top.htm

किंतु इसके बाद प्रोफ़ेसर देव कर ने 2010 में इसी Global Financial Integrity के लिए एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। जिसके मुताबिक़ 60 सालों में 22 लाख 50 हज़ार करोड़ रुपए कालाधन बाहर चला गया। चार साल पहले यह आंकड़ा 72 लाख 80 हज़ार करोड़ आंका गया था। प्रोफ़ेसर देव कर जीएफ़आई से संबंद्ध हैं।http://www.gfip.org/storage/gfip/documents/reports/india/gfi_india.pdf

स्विस बैंकों में कितना धन- प्रामाणिक आंकड़े ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक स्विट्जरलैंड का ताज़ा जीडीपी आंकड़ा करीब $491.92 Billion यानी 22 लाख करोड़ का है। वहां के 300 से ज़्यादा बैंकों में जमा रकम स्विट्जरलैंड की कुल जीडीपी से कहीं ज़्यादा है।

दुनियाभर का एक तिहाई offshore funds (मूल देश के बाहर किसी अन्य देश की बैंक में जमा धन) इस वक़्त स्विस बैंकों में जमा है।

यह रकम 2001 में US$ 2.6 trillion (117 लाख करोड़ रुपए) थी। यह बढ़कर 2007 में US$6.4 trillion (288 लाख करोड़ रुपए) हो गई। अब अनुमान लगाया जा सकता है कि इस वक़्त रकम कमोबेश 360 लाख करोड़ रुपए हो सकती है।

Swiss Accountancy Firm KPMG की रिपोर्ट 2010 के अनुसार बैंकों में जमा आधे से ज़्यादा रकम अवैध [illicit financial transaction] मानी गई है। यह रकम 108 लाख करोड़ रुपए के बराबर है। सनद रहे ये आंकड़ा स्विस फ़र्म का बनाया हुआ है। भारत सरकार की ओर से लेशमात्र का दबाव स्विस बैंकों या वहां की सरकार पर नहीं है। इसके उलट यूरोपीय यूनियन और अमेरिकी सरकार ने कड़ा रुख़ किया हुआ है।

स्वामी रामदेव का दावा है कि भारत का 258 लाख करोड़ रुपए इन दिनों विदेशी बैंकों में जमा है। इसी कालेधन को वापस लाना है।

जानकारों के मुताबिक़ स्विस बैंकों में कालाधन जमा करने वाले देशों में सबसे आगे भारत है

1.         भारत

2.         रशिया

3.         यूके

4.         यूक्रेन

5.         चीन

Wikileaks के मुखिया जूलियन असांज भी मानते हैं कि स्विस बैंकों में जमा कालेधन सबसे ज़्यादा खाते भारतीयों के हैं। हाल ही में स्विस बैंक के पूर्व अधिकारी रूडोल्फ़ एल्मर ने 2000 गोपनीय खातों का ब्यौरा एक सीडी के रूप में जूलियन असांज को सौंपा था।

रुपए को ख़तरा

कोई व्यक्ति रुपया बेचकर स्विस बैंक को मिलियन-बिलियन डॉलर भेजता है। वह फिर स्विस फ़्रैंक्स (स्विस मुद्रा का नाम) खरीदता है। इस तरह लोग रूपये को बेच रहे हैं तथा नतीजा यह हो रहा है कि राष्ट्र की मुद्रा अस्थिर हो रही है। इस प्रकार भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी ही हो रही है। इस तरह दोहरा अपराध हो रहा है। रूपए के इस परिवर्तन के चलते भारतीयों के लिए सभी चीज़ें और महंगी होती हैं।

स्विस बैंक क्यों हैं टैक्स हैवन

दुनियाभर में लगभग 70 देश टैक्स हेवन माने जाते हैं। इनमें स्विज़रलैंड, मारीशस, एंटीगुआ-बरबूड़ा, बेहामास, बहरीन, साइप्रस, दुबई, जिब्राल्टर, मलेशिया, मालदीव, माल्टा, न्यूजीलैंड, पनामा, फिलिपींस आदि।


1934 में स्विस पार्लियामेंट ने एक क़ानून बनाया था, जिसने बैंकिंग क्षेत्र में न केवल गोपनीयता को अपनाया था बल्कि इसका उल्लंघन करने को दंडनीय अपराध भी बना दिया। वहां के कानून में ही यह प्रावधान है कि बैंक ग्राहकों और खाताधारकों से जुड़ी जानकारियां गुप्त रहेंगी। इसी कानून का फायदा उठाकर भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के भ्रष्ट राजनेता, उद्योगपति और नौकरशाह अपना काला धन स्विस बैंकों में जमा कराकर बेफिक्र हो जाते हैं। विदेशों में जमा दुनिया का एक तिहाई धन स्विस बैंकों में जमा है।

नाम नहीं नंबर वाला खाता

स्विट्जरलैंड में 300 से ज्यादा बैंक और बैंक डीलर हैं, इनमें से ये बैंक ज़्यादा मशहूर हैं: UBS, Bank Sarasin & Cie और Credit Suisse. जिस कालेधन के बारे में हम बातें करते हैं। वे बेनामी नहीं होते हैं। बल्कि इन खातेदारों का नाम जानना इसलिए बेहद मुश्किल होता है क्योंकि ऐसे खातों को Numbered Account कहा जाता है। इन खास खातों की जानकारी बैंक के सामान्य कर्मचारियों को भी नहीं होती है।

Source- http://www.swconsult.ch/cgi-bin/banklist.pl

स्विस बैंकों के साथ समस्या

मार्च 2009 में जब ओबामा प्रशासन ने कालेधन ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था तो स्विस बैंकों ने गोपनीयता का रोना रो दिया था। अमेरिका ने अपने 52,000 खातेदारों के बारे में जानकारी मांगी थी। जवाबन स्विस बैंकों ने ऐसे पैसों को इंश्योरंस कवर से कहीं ज़्यादा गोपनीयता वाले प्रावधानों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। Wikileaks बताता है कि स्विस बैंक टैक्स चोरी पर जारी पेनाल्टी की रकम देने पर तैयार हो सकते हैं लेकिन पूरी रकम सीज़ करने पर राज़ी नहीं हो सकते। यह भी ग़ौरतलब है कि स्विस बैंकों के इस धतकरम को वहां की पार्लियामेंट का भी ज़बर्दस्त सहयोग मिलता रहा है।

मज़े की बात यह है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश तो कम से कम स्विस सरकार पर दबाव डालकर यह काम आसान करवा सकता है। क्योंकि ना सिर्फ़ बल के दम पर बल्कि कारोबारी के तौर पर भी अमेरिका में स्विस फ़र्मों की डिपेंडेंसी भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा विस्तृत है।

यहां बात सिर्फ़ गोपनीयता की भी नहीं है। स्विस बैंकों के क़ानून के साथ दिक्कत यह है कि वे सूचना का खुलासा करने से पहले जमाकर्ता के अपराध की पड़ताल कर आश्वस्त होना चाहते हैं क्योंकि टैक्स की चोरी भारत-अमेरिका में जुर्म हो लेकिन स्विज़रलैंड में इसे गुनाह नहीं माना जाता है। ऐसे में कालेधन के खातेदार की जानकारी हासिल करने के लिए आपको उस खातेदार के भ्रष्टाचार में लिप्त होने, ड्रग्स के कारोबार में शामिल होने या आतंकी गतिविधियों में शामिल होने वाले मामले चलाने पड़ते हैं। यानी पहले आप इन पर इस तरह के मुक़दमे चलाइए और उसके बाद कोर्ट वारंट लेकर स्विज़रलैंड जाएं। वहां की ज्यूडिशयरी में इसे सौंपे और अपराधी के बारे में बैंकों से जानकारी मांगे। और ऐसा करना किसी सरकार के लिए ज़्यादा मुश्किल होता है।

Sources:

Global Financial Integrity Report on India 2006 & 2010

KPMG report on Swiss capital market

Business Week magazine report: Swiss Banks:ParadiseLost

CIA Factbook

PTI

Times Now interview with Julian Assange

ANNA HAZARE LIVE from MUMBAI

December 27, 2011 3 comments

Courtesy- IBN & StarManjha

  • अन्ना और साथियों का अनशन टूटा…
  • मनीष सिसोदिया ने बताया कि अन्ना आज बुधवार शाम को अपना अनशन समाप्त करेंगे.
  • केजरीवाल ने साफ़ किया उनका विरोध कांग्रेस के खिलाफ़ इसलिए हैं क्योंकि हमने कांग्रेस को सत्ता सौंपी थी। कांग्रेस अगर चाहे तो सख्त लोकपाल बिल पास करा सकती थी। जब कांग्रेस न्यूक्लियर बिल पास करा सकती है तो सख्त लोकपाल बिल क्यों नहीं? अगर बीजेपी सत्ता में होती तो अन्ना और हम सब उनका भी विरोध करते।
  • अन्ना का अनशन खत्म होगा। जेल भरो आंदोलन भी टला। अब अन्ना पत्रकारों से बात कर रहे हैं।
  • 04.00 PM अनशन के दिन अन्ना हजारे ने कहा है कि अब ये अनशन आज ही खत्म होगा। अन्ना ने कहा कि वे पांच राज्यों में लोकपाल का विरोध करने वाली पार्टियों के के खिलाफ प्रचार करेंगे। अन्ना ने कहा कि वे अब मतदाताओं को जागरूक करने के लिए अपने अभियान पर ज़ोर देंगे.  हज़ारे ने युवाओं से अपील की है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अभियान में उनका साथ दे.
  • 03.00 PM कल की तुलना में आज मुंबई के इस मैदान में 10 हज़ार से ज़्यादा लोग मौजूद हैं। टीम अन्ना के उत्साह में कुछ बढ़ोतरी हुई है। बक़ौल कुमार विश्वास ‘अन्ना के आंदोलन में भीड़ नहीं बल्कि जागरुक जनता आती हैं ‘
  • अरविंद केजरीवाल ने कहा कि लोकसभा से पारित लोकपाल बिल से भ्रष्‍टाचारियों को संरक्षण मिलेगा. केजरीवाल ने मुंबई में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह संसद का नहीं, बल्कि महज सत्ताधारी पार्टी का लोकपाल बिल है. केजरीवाल ने कहा- इस लोकपाल बिल के प्रावधानों से मुताबिक बड़े लोग चोरी करके बच जाएंगे जबकि आम लोगों को ज्‍यादा तकलीफ होगी. उन्‍होंने कहा कि अगर राजा चोरी करता है तो पहले उससे यह पूछा जाएगा कि उसपर एफआईआर दर्ज क्‍यों न किया जाए. दूसरी ओर एक आम आदमी के गुनाह पर उससे कुछ पूछे बिना पहले मामला दर्ज किया जाता है. केजरीवाल ने कहा कि सरकार सीबीआई को अपने शिकंजे से बाहर आने नहीं देना चाहती है. उन्‍होंने आरोप लगाया कि सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती है. उन्‍होंने संजीदा स्‍वर में कहा कि इस देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों का कत्‍ल कर दिया जाता है.
  • 02.00 PM डॉक्टरों ने बताया कि अन्ना का ब्लड प्रेशर 130/90 है। और उन्हें 100 डिग्री बुखार है। अन्‍ना की तबीयत में आज थोड़ा सुधार दिख रहा है। वजन डेढ़ किलो कम हो गया है।
  • 01.40 PM अमिताभ बच्चन ने रिट्वीट किया है.. Mr Hazare’s e.g. tells you why politics is not so easy in India. Building parties, gathering support election after election no child’s play. कम लोगों के आने से गुस्साए एक अन्ना समर्थक ने ट्वीट किया, मुंबईवालों मैं तुम्हारें लिए चूड़ियां भेजना चाहता हूं, बताओं तुम किस रंग की चूड़ियां पहनना पसंद करोगे।
  • 11.00 AM दिग्विजय सिंह  ने ट्वीट कर आंदोलन पर कटाक्ष किया है। उन्होंने लिखा है- ‘हैदराबाद में 150, कोलकाता में 80, मुंबई में 3000, बेंगलुरू में 150, अहमदाबाद में 50 और दिल्‍ली के रामलीला मैदान में केवल 1000। जेल भरो आंदोलन के लिए रजिस्‍टर कराने वाले डेढ़ लाख लोग कहां गए? मीडिया दावा किया करती थी कि अन्‍ना को 120 करोड़ लोगों का समर्थन है। ये लोग अब कहां हैं?

[अनशन का पहला दिन खत्म... दूसरा दिन 29 दिसम्बर बुधवार शुरू ]

  • 11.45 PM लोकपाल को संवैधानिक दर्ज़ा दिलाने वाला प्रस्ताव खारिज हुआ। सदन का बहुमत नहीं जुटा सका। राहुल गांधी ने इसे संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने की वक़ालत की थी। हालांकि लोकपाल बिल पास हो चुका है।
  • लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित:
    11.00 PM संसद में लोकपाल पर दिनभर चली बहस के बाद संशोधनों के साथ आखिरकार दो-तिहाई बहुमत के साथ लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है. समर्थन में 321 मत और विपक्ष में 71 मत पड़े। कुल 394 सदस्य मौजूद थे।
  • 11.00 PM लेफ़्ट ने सदन से वाक आउट किया। इस वक़्त सदन में लेफ़्ट के अलावा बीजू जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, अन्ना द्रमुक, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के सांसद भी बाहर जा चुके हैं।
  • 10.55 PM खबर है कि अन्ना की मेडिकल रिपोर्ट जे जे हॉस्पिटल की ओर से सरकार को दी जाएगी। इसके बाद ही सरकार उन्हें अस्पताल ले जाने पर कोई फ़ैसला कर सकती है।
  • संशोधन प्रस्तावों के बाद सदन में लोकपाल बिल और व्हिसिलब्लोअर बिल पर एक साथ वोटिंग होनी हैं.
  • 10.50 सरकार की ओर से पेश सभी संशोधन प्रस्ताव पास हो गए हैं।
  • 10.42 अन्ना की तबियत खराब है। खबर है कि ब्लड रिपोर्ट का इंतज़ार है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक़ अगर अन्ना की तबियत ज़्यादा खराब होती है तो उन्हें हॉस्पिटल में दाखिल किया जा सकता है।
  • 10.30 PM लोकपाल के दायरे में कारपोरेट और मीडिया पर नियंत्रण के लिए लाया गया वसुदेव आचार्य का संशोधन प्रस्ताव 69 के मुक़ाबले 247 मतों से खारिज हुआ। लेफ्ट के सुझाए संशोधनों पर बीजेपी ने वोटिंग नहीं की।
  • विपक्ष के लाए संशोधनों पर मतदान जारी है। सीपीएम, बीजेडी और बीजेपी का संशोधन प्रस्ताव खारिज हुआ। अभी और भी संशोधन प्रस्ताव लाए जाने हैं। स्पीकर मीरा कुमार हरेक संशोधन प्रस्ताव पढ़कर ध्वनिमत के आधार पर फैसला कर रही है।
  • 10.00 PM मतदान शुरू हो चुका है लोकसभा में.. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने सदन से वाकआउट किया। दोनों के 43 कुल सांसद हैं।
  • 09.57 PM अन्ना की तबियत बिगड़ी हुई है। अभी अभी एम्बुलेंस पहुंची है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अन्ना से अनशन खत्म करने की अपील की है।
  • लोकसभा में पार्टियों की स्थिति- कांग्रेस के पास अपने 207 सांसद हैं, तृणमूल कांग्रेस के 19, डीएमके के 18, एनसीपी के 9, नेशनल कॉन्फ्रेंस के 3, आरएलडी के 5 और 9 छोटी पार्टियों के 11 सांसद यूपीए में शामिल हैं. ये आंकड़ा होता है कुल 272 सांसदों का. 272 में 4 निर्दलीय सांसदों के समर्थन को भी जोड़ दीजिए तो आंकड़ा होता है 276. सरकार को तीन पार्टियां बाहर से समर्थन दे रही हैं. 22 सांसदों वाली मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, 21 सांसदों वाली मायावती की पार्टी बीएसपी, 4 सांसदों वाली लालू की आरजेडी और 3 सांसदों की एच डी देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस.
  • बाहरी समर्थन देने वाली पार्टियों के 50 सांसदों के समर्थन से ये आंकड़ा होता है कुल मिलाकर यूपीए के पास होता है 326 सांसदों का समर्थन. बाहरी समर्थन- 50, समाजवादी पार्टी-22, बीएसपी 21, आरजेडी-4, जेडीएस-3.
  • लोकसभा में तो सरकार बिल पारित करा सकती है लेकिन राज्यसभा और राज्यों से बिल पर मुहर लगाने के लिए बहुत जरूरी है कि बीजेपी सरकार का साथ दे. बीजेपी के रुख से लगता नहीं है कि वो जस का तस लोकपाल बिल पास करने में सरकार की कोई मदद करने वाली है.
  • 09.15 PM लोकसभा में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी बोल रहे हैं। आज लोकसभा में व्हिसिलब्लोअर बिल और लोकपाल बिल पर वोटिंग भी होनी है।
  • 09.10 PM अन्ना की तबियत खराब है। डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें 102 डिग्री बुखार है। ब्लड प्रेशर 170/96 है और पल्स रेट 98… केजरीवाल समेत वहां मौजूद लोगों ने उनसे अनशन तोड़ने की अपील की है। लेकिन अन्ना डटे हुए हैं।
  • 09.00 PM वोटिंग के दौरान मौजूद रहने के लिए राहुल गांधी लोकसभा पहुंच चुके हैं।
  • इस वक़्त की बड़ी ख़बर ये है कि स्वामी रामदेव ने अन्ना हज़ारे के न्यौते को स्वीकार कर लिया है। रामदेव गुरूवार यानी अनशन के आखरी दिन मुंबई पहुंचेंगे।
  • लोकसभा में असदुद्दीन ओवेसी और इंदरसिंह नामधारी ने संबोधित किया।
  • इस वक़्त कई चैनल और बुद्धिजीवी इस चर्चा में उलझे हैं कि दिल्ली की तरह मुंबई में अन्ना को ज़्यादा समर्थन नहीं मिला। मुंबई में मौजूद भीड़ दस हज़ार से कम ही थी। इधर दिल्ली में भूषण पिता-पुत्र के बैठने की वजह से भीड़ नाममात्र की मानी गई। भूषण के कश्मीर संबंधी विवाद के मद्देनज़र भीड़ कम आई ऐसा माना जा रहा है। हालांकि बुधवार को किरण बेदी दिल्ली पहुंचेंगी।  दोपहर में अन्ना ने रामदेव को न्यौता भेजा है। india tv के हवाले से खबर ये है कि इस वक्त रात नौ बजे अन्ना के सामने केवल पांच सौ लोग बैठे हैं। दिन में अधिकतम बारह हज़ार लोग थे। शायद कल भीड़ में बढ़ोतरी हो।
    कम भीड़ के पीछे मैं ये वजह देखता हूं-
    -पिछली बार अन्ना को गिरफ्तार किया गया था। लोगों को अचानक गुस्सा आया।
    -रामदेव पर लाठी चार्ज हुआ था। गुस्सा था।
    -अनशन अनिश्चितकालीन था। सवाल ज़िंदगी का था। कुछ निर्णायकात्मक करना था।
  • 08.00 PM NDA संसदीय दल की बैठक में फैसला हुआ कि उसके सांसद लोकपाल को संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने का विरोध करेंगे। विदित हो कि डेढ़ घंटे के भीतर इस बिल पर वोटिंग होनी है।
  • 07.30 PM शशि थरूर लोकसभा में बोले। उन्होंने कहा पार्टियों में असहमति के बावजूद लोकपाल क़ानून बनने दिया जाना चाहिए ताकि उस अनुभव से कुछ बेहतर किया जा सके.
  • 07 PM सदन में बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा बोल रहे हैं। आज सुबह से सदन में बहस जारी है लेकिन हम सबके प्यारे युवराज बाबा दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐसे आलतू-फालतू में उनका क्या काम?  शायद वे अपने ‘मिशन’ की तैयारी में व्यस्त हैं।
  • एक बार फिर लालू यादव की जोकरी देखने मिली।मेरे ख्याल से जोकर सम्मानित होता है। और लालू मुझे जोकर नहीं दिखते। कम से कम गंभीर विषयों पर उनकी हंसी ठिठोली से उनका व्यक्तित्व झलकता है। यादव ने कहा कि लोकपाल विधेयक को संशोधन के लिए दोबारा स्थायी समिति के पास भेजा जाना चाहिए. मौजूदा तंत्र को छेड़ना सही नहीं है, साथ ही सिर्फ ऐसा भर करने से अनशन का दबाव ख़त्म नहीं होगा.उन्होंने अन्ना की चिट्ठी दिखाते हुए कहा कि राजू परेलुकर के हाथों लिखी इस चिट्ठी में लिखी बातों पर पढ़ते हुए अन्ना पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। ये आंदोलन अंतरराष्ट्रीय साज़िश है। उन्होंने चुटकी ली कि हमें अन्ना के लिए आल इंडिया अन्ना हेल्थ कमेटी बनानी चाहिए। इस पर मनीष सिसोदिया की प्रतिक्रिया थी कि लालू ने अन्ना की तबियत का मज़ाक उड़ाया है।
  • 06.00 PM राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव अब लोकसभा में बोल रहे हैं.
  • 05.18 PM संगीतकार विशाल डडलानी अपना गीत पेश कर रहे हैं…मुंबई में इस वक़्त 10 हज़ार लोग मौजूद हैं।
  • 05.00 PM प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लोकसभा में बोल रहे हैं। हम एक पारदर्शी और ईमानदार सरकार के पक्ष में रहे हैं। हमने जनता की खातिर कई बड़े क़ानून बनाए हैं। हमने मनरेगा और एनआरएचएम जैसे कानून बनाए। शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया। सीबीआई को लोकपाल के नियंत्रण में लाया गया तो संसद के बाहर कार्यपालिका की शक्ति चली जाएगी जो अंसवैधानिक होगा। समूची नौकरशाही को भ्रष्ट बताना उनकी सेवाओं का अपमान है और अन्याय भी। सभी को एक डंडे से नहीं हांका जा सकता। बिना जवाबदेही के किसी संस्था या व्यक्ति को असीमित अधिकार नहीं दिए जा सकते। उन्होने कहा कि भ्रष्टाचार केवल लोकपाल लाने से दूर नहीं होगा। उन्होने अपील की कि राजनीति से परे होकर सभी दल इस बिल को अपना समर्थन दें।
  • 04.30 PM एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले लोकसभा में बोल रही हैं। उन्होंने बिल को समर्थन देते हुए सरकार पर अपना भरोसा जताया।
  • 04.45 PM प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लोकसभा में बोल रहे हैं।
  • NDTV के हवाले से ख़बर है कि लोकपाल बिल में संशोधनों पर चर्चा के लिए कुछ ही देर में कांग्रेस कोर कमेटी की मीटिंग होगी।
  • 04.00 प्रीतिश नंदी मंच ने जनसभा को संबोधित किया।
  • सरकार ने शीतकालीन सत्र के बढ़े हुए सत्र में ही लोकपाल बिल पास कराने के लिए कमर कस ली है। सरकार का कहना है कि वह आज ही लोकपाल बिल पर वोटिंग कराएगी चाहें इसके लिए कितनी भी देर तक संसद की कार्रवाई करनी पड़े। खबर यह भी आ रही है कि लोकसभा की कार्रवाई आज शाम 8 बजकर 15 मिनट तक चलेगी।
  • 03.58 PM उदय मोहिते सोलह दिन से अनशन पर हैं। वे अन्ना से मिलने मंच पर आए।
  • 3.40 PM अनुपम खेर मंच पर पहुंचे। उन्होंने कहा राजनीतिज्ञ जाति पाति और धर्म के नाम लोगों को बांट रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। अनुपम खेर ने धर्मवीर भारती की कविता पढ़ी।
  • अन्ना ने बाबा रामदेव को न्यौता दिया है। उन्होंने जनता को बताया कि एक दो दिन में रामदेव मुंबई आएंगे।
  • 0338 PM अन्ना का भाषण खत्म हुआ।  उधर संसद में शरद यादव भी अपना संबोधन समाप्त कर चुके हैं।
  • 03:00 PM अन्ना बोलने के लिए खड़े हुए। आज दिन में पहली बार अन्ना संबोधित कर रहे हैं। 25 साल से भ्रष्टाचार से लड़ रहा हूं। लोकपाल के मसले पर केंद्र ने हमसे विश्वासघात किया है। ये विश्वासघात केवल अन्ना टीम से नहीं बल्कि पूरे देश के साथ किया गया है। तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है। अभी गाड़ी में तीन घंटे खड़े होकर आया हूं। अन्ना ने ज़मीन अधिग्रहण के तरीक़ों का विरोध किया। कहा कि देश की पार्लियामेंट से ऊपर विलेज पार्लियामेंट है। बिना गांव की मंजूरी के केंद्र या राज्य की सरकारें ज़मीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती है। इसके लिए भी क़ानून बनना चाहिए। सरकार अब हुकुमशाही कर रही है ये लोकशाही नहीं है। राजनीति में अब गुनहगार आने लगे हैं। इसलिए जनलोकपाल के बाद हमें क़ानून बनाना है राइट टू रिजेक्ट। मैं इन चुनावों में पांचों राज्यों का दौरा करूंगा। ये आज़ादी की दूसरी लड़ाई है। भारत के कानून इंग्लैंड में नहीं बन रहे हैं। भारत के कानून भारत में बनेंगे। राइट टू इन्फर्मेशन कानून के चलते राजा, कलमाड़ी जेल गए।’
  • 2.30 PM डॉक्टरों की टीम ने किया अन्ना का दोपहर ढाई बजे चेकअप किया है। जनलोकपाल के ट्विटर खाते पर अन्ना के सेहत की जानकारी दी गई है। अन्ना का ब्लड प्रेशर 140/86, पल्स 84/मिनट है। इस हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक अन्ना को बुखार नहीं है। Janlokpal tweets -Anna Hazare health Update from MMRDA: BP 140/86… pulse; 84/min.. No Fever
  • 1.30 PM केजरीवाल ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, ‘हम देखना चाहते हैं कि संसद सरकार से अपने अपमान का बदला कैसे लेती है। सरकार ने संसद का अपमान किया है। सरकार ने हमें धोखा दिया है। हमें दो-दो बार धोखा दिया गया है। जब हमारे देश के प्रधानमंत्री संसद का अपमान करेंगे तो देश में कैसा जनतंत्र होगा मैं आपसे पूछना चाहता हूं। सरकार का बिल बेहद कमजोर है। यह बिल भ्रष्टाचार करने वालों को संरक्षण देने का काम करेगा। यह पूरा का पूरा कानून राजा और कलमाड़ी जैसे चोरों को बचाने के लिए बनाया गया है। प्रधानमंत्री को शर्म आनी चाहिए। यह आर-पार की लड़ाई है।’ केजरीवाल ने बताया, ‘हम सबने अन्ना जी से उपवास न रखने का निवेदन किया लेकिन वे नहीं माने। मैं, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास अनशन कर रहे हैं।’ इससे पहले किरण बेदी और मेधा पाटकर ने भी समर्थकों को संबोधित करते हुए वहां आने के लिए सबका शुक्रिया अदा किया।
  • 12: 20 खुले ट्रक में एमएमआरडीए पहुंचे  अन्ना
  • 11:10-विले पार्ले पहुंचा हजारे का काफिला।
  • अन्ना जुहू बीच से एमएमआरडीए मैदान खुले ट्रक में पहुंचे। रास्ते में उनके समर्थकों ने जगह-जगह उनका स्वागत किया। जुहू पहुंचने से पहले अन्ना का रास्‍ता रोका गया और उन्‍हें काले झंडे दिखाए गए।
  • 10:25- हजारे जुहू से अनशन स्थल मरदा मैदान के लिए रवाना।
  • 9.55 am: अन्ना हजारे ने जुहू बीच पहुंचकर महात्मा गांधी की प्रतिमा का माल्यार्पण किया और दस मिनट तक वहीं बैठे रहे।
  • 9.48 am: बांद्रा के गेस्ट हाउस से जैसे ही अन्ना बाहर निकले उन्हें काले झंडे दिखाए गए।
  • 9.25 am: संतोष हेगड़े ने कहा। वे महसूस करते हैं कि अन्ना को उपवास पर नहीं बैठना चाहिए।
  • 8.02 am: अन्ना के सहयोगी के हवाले से खबर है कि अन्ना का स्वास्थ ठीक नहीं है. लेकिन वे उपवास पर बैठेंगे।

Anna Hazare LIVE from Jantar Mantar जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे

December 11, 2011 Leave a comment

Anna Hazare Live from Jantar Mantar

जंतर मंतर पर अन्ना का अनशन पार्ट 3 -इंडिया टीवी पर सीधा प्रसारण- सीधी बहस..
LIVE INDIA TV – http://www.indiatvnews.com//channel/program_details.php?id=1&mod=16

ARVIND KEJRIWAL in Aap Ki Adalat.. Interviewed by Rajat Sharma
Watch Tonight at 10 SUNDAY on India TV

http://www.indiatvnews.com//channel/program_details.php?id=1&mod=16

अन्ना प्लीज़ विकल्प दीजिए

August 25, 2011 3 comments

-डॉ. संदीप कुमार (लेखक इंडिया टीवी में रिसर्चर हैं)

ब बस… बहुत हो चुका। या तो अनशन खत्म करके वापस रालेगांव सिद्दी जाओ और दोबारा देश को जगाने के लिए कोई अनशन न करना। क्योंकि हमारे पास कोई ‘विकल्प’ नहीं है, किसका चुनाव करूं? किसको वोट दूं?, चोरों में एक शरीफ़ चोर को चुनना ही है। बताइए मैं क्याकरूं? प्रिय अन्ना, देश में नई पार्टी का गठन कर राजनीति की कीचड़ को साफ करने के लिए उतरो। अन्ना, अब यह बोलना बंद करो कि “न कभी राजनीति में आएंगे और न ही कभी चुनाव लड़ेंगे”और न ही यह कहो कि “राजनीति कीचड़ है हम मैले नहीं होना चाहते”।

अन्ना जिस तरह से आपने देशभर में भ्रष्टाचार के विरूद्ध बहुत बड़ी जागृति पैदाकर देश के लोगों को एकजुट कर दिया है। आपको देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है उसे देखकर दिल से एक ही आवाज़ निकलती है कि अन्ना न केवल आपके पास राजनीति में आने का माद्दा है बल्कि इस कीचड़ को साफ करने की क्षमता भी हैं। लेकिन मुझे ये क्यों लगता है कि आप राजनीति में नहीं आएंगे क्योंकि कीचड़ से मैले होने का डर है। अगर नाले साफ़ करने वाले मुनिसिपल्टी के कर्मचारी भी यही कहें की “नाला बेहद गंदा है मैं साफ़ नहीं करूंगा कीचड़ लग जाएगी”, बताईए क्या करेंगे आप? एक दिन ऐसा आएगा की नाला भरते-भरते कीचड़ सड़क पर और फिर आपके घरों तक पहुंच जाएगा। और यह तो पहुंच भी चुका है। ऐसे में आप क्या करेंगे, कीचड़ में तो कूदना ही पड़ेगा क्योंकि अपने घर को हम गंदा होते कब तक देखते रहेंगे। एक कोशिश तो कीजिए।

संसद भरी पड़ी है इस कीचड़ से। 15वीं लोकसभा में 543 सांसदो में से 150 सांसद भष्ट्र और आपराधिक चरित्र वाले हैं, जिसमें से 72 सांसद ऐसे हैं जिन पर हत्या, लूटपाट, बलात्कार, अपहरण और दूसरे जघन्यू अपराधों में 213 मामलों में आरोपी हैं। इस गंदगी के होते हुए कैसे जन लोकपाल बिल पास हो सकता है। कोई भी आपराधिक चरित्र वाला सांसद क्या अपने गले में फांसी का फंदा लेकर बिल पास करने के लिए बटन दबाएगा? खुद आपकी बातों से भी कई बार लगा की बिल पास कराना आसान नहीं होगा।

अन्ना कहा जाता है देश में जनता फिल्मों से बहुत कुछ सीखती है। अन्ना, एक फ़िल्म का संवाद मुझ इस मौजू पर मुफ़ीद लग रहा है। ज़रा आप देखें और सोचें।

चुनौती संसद को नहीं, मौजूदा राजनीति को

August 25, 2011 1 comment

अन्ना का आंदोलन संसद को चुनौती नहीं बल्कि मौजूदा राजनीति को है। अभी भी चेतने का वक़्त है। राजनीतिज्ञों के लिए। उन पर भरोसा टूटा है। लोकतंत्र में यह ख़तरा बड़ा है। संसद बनाम जनता के विवाद से कहीं ज़्यादा।

-हेमंत शर्मा (लेखक इंडिया टीवी में न्यूज़ डायरेक्टर हैं। आलेख दैनिक भास्कर में 25 अगस्त 2011 गुरूवार को प्रकाशित )

नता बड़ी है या संसद? यह बेहूदा बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नहीं, संसद में बनता है। अन्ना संसदीय प्रक्रिया की अवमानना कर रहे हैं। अन्ना संसदीय प्रक्रिया को ब्लैकमेल और बुलडोज़ कर रहे हैं। पर इन कुतर्कों की आड़ में अब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठा जनसैलाब नहीं रुकने वाला। अगर इन दावों में सच्चाई थी तो आज सरकार घुटनों के बल बैठकर अन्ना की मांगे मानने पर सहमत क्यों हो रही है। दरअसल, अन्ना के बढ़ते जनसमर्थन से जब डर लगा तो संसद के भी हाथ-पांव फूले और बातचीत शुरु हुई। यानी बात पहले भी हो सकती थी। बहानेबाज़ी के बजाय।

हमारे लोकतंत्र में संप्रभुता जनता के पास है। संसद उससे प्रभुता पाती है। जनता की कोख से ही संसद का जन्म होता है। वही जनता जिसका वोट तंत्र को लोक देता है। पांच साल के लिए संसद चुन क्या लोक अपने हाथ-पांव काट, मुंह पर पट्टी बांध ले? मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल के उक्त विचारों से तो ऐसा ही लगता है। डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि ज़िन्दा क़ौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। बाद के समाजवादियों ने उसे और आगे बढ़ा दिया कि ज़िंदा क़ौमें कभी इंतज़ार नहीं करतीं। जे.पी. ने भी वायदे पूरा ना कर पाने पर जब प्रतिनिधि वापस बुलाने की बात की थी तो क्या ये जननेता संसद की अवमानना कर रहे थे? जनआंदोलनों के ये दोनों नेता जनता की सर्वोच्चता मानते थे।

कोई इस सरकार से पूछे कि संसद की गरिमा कौन गिरा रहा है? जन-आंदोलनों से संसद की गरिमा नहीं गिरती। सदन की गरिमा गिरती है ए.राजा, कनिमोझी और कलमाड़ी जैसे सांसदों से। संसद की गरिमा गिरती है इस सूचना से कि 543 सांसदों में से कोई डेढ़ सौ (28 प्रतिशत) आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। सदन की गरिमा गिरती है कैबिनेट प्रणाली के इतर एक सुपर कैबिनेट से जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद कहते हैं। संसद की गरिमा गिरती है जब संसदीय फ़ैसले सदन के बाहर 10 जनपथ में लिए जाते हैं। संसद की गरिमा अन्ना नहीं गिरा सकते जिनकी आस्था गांधीवादी मूल्यों में है। सादगी, ईमानदारी और सत्याग्रह जिसके हथियार हैं। वरना है किसी राजनीतिक दल में ताक़त जो समूचे देश में एक आवाज़ पर इतने लोगों को सड़कों पर निकाल दे।

दरअसल अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कांग्रेस और सरकार की नीयत कभी साफ़ नहीं रही। हर बार दोहरे मापदण्ड रहे। दोहरी भाषा थी। नीयत भी अन्ना और उनके समर्थकों को ध्वस्त करने की रही। मौजूदा गतिरोध के मूल में यही वजह थी। पहले कहा गया कि अन्ना का अनशन संविधान विरोधी है। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना दें तो गांधीवादी। अन्ना संविधान विरोधी। फिर अन्ना और उनकी टीम की छवि को ध्वस्त करने के लिए बेबुनियाद आरोपों का दौर चला। ऐसे आरोप लगे कि संवाद टूट गया। टीम अन्ना का रवैया सख्त हुआ। गतिरोध इस कदर बढ़ा कि बात कौन करे इस बात का संकट था। सारी फ़जीहत कराने के बाद सरकार ने प्रणब मुखर्जी को आगे किया। शायद पहली बार सरकार को समझ आया कि मसला राजनीतिक है। इसका वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी हल नहीं निकाला जा सकता।

यह समझ की दरिद्रता है कि अन्ना के आंदोलन को अवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कहा गया। गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को ब्लैकमेल कहा गया। अनशन और सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने का ब्रह्मास्त्र माना था। आज उन्ही गांधी की पार्टी का सत्याग्रह के ख़िलाफ़ यह रवैया है। वैसे आज की कांग्रेस से गांधी की समझ रखने की अपेक्षा नादानी है। क्योंकि आज के ज़्यादातर कांग्रेसियों की गांधी के प्रति समझ मुन्नाभाई फ़िल्म देखकर बनी है। इसलिए सत्याग्रह और अनशन पर अगर सरकार का रुख़ ऐसा है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जिन्हें इस वक्त संसदीय प्रणाली याद आ रही है। वे उस वक्त कहां थे जब लोकपाल बिल की ड्राफ़्टिंग कमेटी में विपक्ष का कोई प्रतिनिधि नहीं था। सिर्फ़ नागरिक जमात और सरकार मिलकर बिल बना रहे थे। अब जब मामला फंसा तो विपक्ष याद आया। सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। संसदीय प्रणाली में विपक्ष के बिना भी क़ानून बनता है। उस वक़्त इस प्रणाली का ध्यान क्यों नहीं रहा। उस वक़्त सरकारी अहंकार ने विपक्ष को हाशिए पर डाल क़ानून का मसविदा बना दिया। जिसे बाद में सिविल सोसाइटी ने ख़ारिज किया। तब प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।

आंदोलन के प्रति कांग्रेस की ‘मिसहैंडलिंग’ का नुकसान तो राहुल गांधी को भी हो गया। इसका असर चुनाव में दिखेगा। जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने मुद्दा बनाया। ग़ैरकांग्रेसी राज्यों में जाकर ज़ोर-ज़ोर से कहा दिल्ली से जो पैसा चलता है वह ज़िलों तक नहीं पहुंचता। बिचौलिए खा जाते हैं। अन्ना इसी भ्रष्टाचार को मिटाने की बात तो कर रहे थे। पूरे आंदोलन में राहुल गांधी की रहस्यमयी चुप्पी ने राहुल की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के प्रति संदेह पैदा किया है। उनकी लड़ाई दिखावा नज़र आई। अब वे कैसे इस सवाल को फिर से उठाएंगे। इस घमासान में सरकार का इक़बाल भी गया और पार्टी की साख भी। जनाक्रोश का निशाना अलग बनी। हालांकि पूरी फ़जीहत कराने के बाद सरकार हर सवाल पर घुटने के बल बैठी। सरकार ने वही किया जिसे पहले किया जा सकता था।

न दबाव और आंदोलन दरअसल प्रक्रियागत पेचीदगियां, प्रणाली और क़ायदे-क़ानून नहीं समझते। लोगों के इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है कि 62 साल से लोकपाल क्यों अटका रहा। कितनी बार संसद में पेश हुआ। कितनी बार स्थायी समिति में गया। अब सरकार फिर से स्थायी समिति की आड़ में और ज़्यादा समय क्यों चाहती है। आम जनता सिर्फ़ यह समझती है कि जब सांसदों की अपनी तनख़्वाह और सुविधा बढ़ाने की बात होती है तो बिल तीन मिनट में पास हो जाता है लेकिन स्थायी समिति के अध्यक्ष लोकपाल के सवाल पर अभी तीन महीने का वक़्त और चाहते हैं।

आंदोलन की हवा निकालने के लिए षड़यन्त्र चौतरफ़ा हुए। पर हर षड़यन्त्र पर आंदोलन ने और ज़ोर पकड़ा। यही इसकी ताक़त थी। सही है कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आज़ादी सबको है। लेकिन जब आंदोलन चरम पर हो अन्ना की जान कैसे बचे इसकी चिंता सब कर रहे हों। ऐसे वक्त नागरिक जमात में भेद पैदाकर एक और बिल लेकर कुछ लोग नमूदार हुए। यह कितना औचित्यपूर्ण था। सवाल बड़ा है। टाइमिंग को लेकर। अब तक यह बिल कहां था? मालूम हो कि बिल का प्रारूप देने वाली अरूणा रॉय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य हैं।

अन्ना का यह आंदोलन कोई अचानक फूटा लोगों का ग़ुस्सा नहीं है। लोगों का ग़ुस्सा सालों से सुलग रहा था। गए एक साल में परत दर परत भ्रष्टाचार और घोटालों का जो खुलासा हुआ उसने इस आंदोलन की ज़मीन तैयार की थी। पिछले एक साल में सबसे ईमानदार सरकार के दो लाख करोड़ का घोटाला सामने आया। पहले आदर्श सोसायटी फिर टूजी स्पेक्ट्रम फिर राष्ट्रमंडल खेल, उसके बाद एयर इंडिया में जहाज़ों की ख़रीद का मामला और अब ताज़ा मामला के. जी. बेसिन से भ्रष्टाचार का दानव निकला। अन्ना ने तो सुलग रही आग की सिर्फ़ राख झाड़ी है। लपटें तो पहले से मौजूद थीं। अन्ना का आंदोलन चुनौती संसद को नहीं मौजूदा राजनीति को है। अभी भी चेतने का वक़्त है। राजनीतिज्ञों के लिए। उन पर भरोसा टूटा है। लोकतंत्र में यह ख़तरा बड़ा है। संसद बनाम जनता के विवाद से कहीं ज़्यादा।

मध्यवर्ग की लहरों पर सवार अन्ना

August 21, 2011 2 comments

अमर उजाला में 20 अगस्त को प्रकाशित आलेख (अप्रकाशित हिस्सा भी शामिल-असंपादित)

लेखक- हेमंत शर्मा

रकारी झूठ। तंत्र की बेशर्मी। कांग्रेस की राजनैतिक मूर्खताओं ने अन्ना हजारे को महानायक बना दिया। देखते ही देखते अन्ना भष्ट्राचार के खिलाफ एक ‘ब्राण्ड’ बन गए। ठीक उसी तरह जैसे आज़ादी की लड़ाई में गांधी ‘ब्राण्ड’ बन गए थे। अन्ना अब किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। बेदाग़ छवि का नाम है अन्ना। अन्ना प्रतीक हैं भ्रष्ट व्यवस्था से जूझने का। अन्ना नाम बन गया है संकल्प और दृढ़ निश्चय का। इसलिए 16 अगस्त को एक अन्ना के गिरफ़्तार होते ही देशभर में करोड़ों अन्ना सड़क पर हैं। कांग्रेस और सरकार के होश उड़ गए और वह ग़लतियों पर ग़लतियां करती रही। लगा मानो सरकार नहीं है। अन्ना की हर शर्त पर दम तोड़ती नज़र आई सरकार।

केंद्र सरकार ‘अन्ना डिजास्टर’ का प्रबन्धन करने में फेल रही। अन्ना पर लगातार ‘स्टैंड’ बदल कांग्रेस ने जिस बदहवासी और बौखलाहट का परिचय दिया, उससे साफ़ है कांग्रेस, जनता और समाज से कितना कट चुकी है। उसे ज़मीनी असलियत का पता नहीं है। अन्ना के दमन से ऐसा जनसैलाब उमड़ेगा इसका आकलन सरकार और पार्टी दोनों को नहीं था। सरकार जनमानस को समझने के बजाए कुछ वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी इबारतें पढ़ती रही और लोक के आगे तंत्र बौन हो गया।

वाल अब अन्ना या लोकपाल का नहीं है। बात आगे बढ़ चुकी है। इस मुल्क़ में लोकतंत्र रहेगा या नहीं यह बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। क्या इस देश में विरोध, धरना प्रदर्शन किसी व्यक्ति या सरकार से पूछकर होगा? और वह भी जिसके खिलाफ़ प्रदर्शन होना है। क्या राहुल गांधी अब मायावती से इजाज़त लेकर उत्तरप्रदेश में अपना धरना प्रदर्शन करेंगे? सरकार की सोच देखिए। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना प्रदर्शन करें तो गांधीवादी। दिल्ली में अन्ना अनशन करें तो असंवैधानिक। क्योंकि ‘वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति’।

रअसल कांग्रेस ने बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस शर्मनाक ढंग से कुचला था। उससे केंद्र मैं बैठी सरकार का न सिर्फ़ अहंकार बढ़ा बल्कि दमन की उसकी हिम्मत भी बड़ी। सरकार ने अन्ना के साथ भी वही तरीक़ा अपनाया जो हथकंडे ग़ुलाम भारत में ब्रिटिश हुकूमत अपनाती थी। लेकिन बिना किसी संगठन के अन्ना का आंदोलन गुजरात से गुवाहाटी तक जिस ढंग से फैला उससे सरकार घुटनों के बल बैठ गई। सरकार के खिलाफ़ देशभर में आक्रोश की जो लहर उमड़ी उसने जाति, वर्ग और उम्र की सीमा तोड़ी। अब तक जो लोग यह कहते थे कि भ्रष्टाचार अब इस देश में मुद्दा नहीं रहा। वे ग़लत साबित हुए। शहरी मध्यवर्ग और नौजवानों को लगा कि अन्ना की हार उनकी निजी पराजय है। अगर यह आंदोलन कुचला गया तो राजनेता निरंकुश हो जाएंगे। गांधी के अनशन का हथियार हमेशा के लिए कुंद हो जाएगा। यह मौका कहीं बेकार न चला जाए। इसी डर ने आम लोगों को सरकार के खिलाफ़ अपनी नाराज़गी जताने और सड़क पर आने को मजबूर किया।

विडम्बना देखिए जिन भ्रष्टाचारियों को अन्ना तिहाड़ में बंद देखना चाहते थे सरकार ने उसी जेल में अन्ना को कैद कर लिया। फिर सरकार को 12 घंटे के भीतर घुटने टेकने पड़े। अन्ना की रिहाई के आदेश हुए। अन्ना ने रिहाई से मना किया। सरकार और झुकी। उसने अनशन की भी इजाज़त दे दी। इस घटनाक्रम में सरकार का इक़बाल गया और कांग्रेस पार्टी की साख भी। अन्ना ने कांग्रेस का जो नुकसान अकेले कर दिया वह नुकसान पूरा विपक्ष मिलकर अब तक के कार्यकाल में नहीं कर पाया था।

न्ना ने एक झटके में सरकार का नैतिक बल ख़त्म कर दिया। अन्ना के आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि को ध्वस्त कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छिड़ी जंग कांग्रेस के खिलाफ़ जंग में तब्दील हो गई। कांग्रेस अनायास भ्रष्टाचार के समर्थक पाले में खड़ी नज़र आई। पहली दफ़ा अन्ना ने शहरी अराजनैतिक वर्ग को सड़कों पर उतारा। जिस युवावर्ग के ज़रिए कड़ी मेहनत कर राहुल गांधी अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे थे। वह नौजवान एक झटके में इस 74 साल के इस बूढ़े के साथ चला गया। राजनीति मंडल आंदोलन के बाद पहली बार संसद से निकल कर सड़क पर आई। और बिना आपातकाल लगे अन्ना ने समूचे विपक्ष को एकजुट कर दिया वामपंथियों से लेकर भाजपा तक। ये है अन्ना की कामयाबी और कांग्रेस की नाकामी।

पिल सिब्बल, चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी हमारे लोकतंत्र के नए जमींदार हैं। ये देश को अपनी जागीर समझते हैं। उनके बयानों की भाषा से तो यही लगता है। यही वजह रही कि इनके बयानों से यह आंदोलन ज्यादा भड़का है। इन्हें नहीं पता कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं होता। इसमें असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। दिग्विजय सिंह ने अन्ना को सलाह दे डाली कि राजनीति करनी है तो अन्ना सीधे चुनाव क्यों नहीं लड़ते। पर दिग्विजय सिंह यह सुझाव पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को क्यों नहीं देते? कपिल सिब्बल एक ही राग अलापते हैं कैसा क़ानून बने, यह संसद का अधिकार है। कोई दवाब बनाए यह असंवैधानिक है। पर सिब्बल जी जब नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की राय को आप क़ानून मानते हैं तो संसद के सामने नागरिक जमात क्यों अपनी राय नहीं रख सकती?

कांग्रेस पार्टी ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन को ‘हैंडल’ किया उस पर सभी को हैरानी है। पहले एक क़दम आगे फिर दो क़दम पीछे। लगातार नासमझी से भरे फ़ैसलों से ही इस सरकार की किरकिरी हुई। हो भी क्यों ना? जब आपके सलाहकार कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे लोग होंगे तो यही होगा। क्योंकि वे जनमानस को पढ़ने की बजाय क़ानून की इबारत पढ़ते हैं। कांग्रेस के इन रणनीतिकारों को न देश की समझ है न समाज की। ये वक़ील ‘क्लायंट’ को तो समझ सकते हैं पर देश की नब्ज़ का इन्हें अहसास नहीं है। इनका हिन्दुस्तान दूसरा है। ये गांव-देहात नहीं समझते। जिमखाना समझ रखते हैं। जब संतरी मंत्री बनेंगे तो शायद ऐसे संकट खड़े होंगे। यह राजनैतिक नासमझी और प्रबन्धन की विफलता नहीं तो और क्या है? जो भाजपा अब तक विपक्ष के लिए अछूत बनी थी वह सरकार की करतूतों से फिर विपक्षी एकता की धुरी बनने लगी। अन्ना के सवाल पर सीपीआई से लेकर मुलायम सिंह यादव तक भाजपा के साथ खड़े नज़र आए। ऐसी विपक्षी एकता इमरजंसी में हुई थी। सरकार के प्रबंधकों ने बिना इमरजंसी लगाए ऐसी स्थिति फिर से पैदा कर दी।

न्ना के इस आंदोलन से सबसे ज्यादा झटका राहुल गांधी को लगा है। पूरे देश के नौजवानों ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन में हिस्सा लिया, शहरी युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा। वे राहुल की राजनीति के लिए ख़तरे के संकेत हैं। राहुल देशभर में घूम घूमकर इसी नौजवान पीढ़ी से सहारे राजनीति पर काबिज़ होना चाहते थे। एक झटके में यह आधार इस बूढ़े के साथ चला गया। क्योंकि भ्रष्टाचार से त्रस्त युवाओं को अन्ना के आंदोलन में एक विश्वास और भरोसा दिखा। जिसे राजनीतिक दलों ने तोड़ा था।

राहुल गांधी की राजनैतिक शैली में कांग्रेस के जो युवा, संगठन और सरकार में आए थे उससे एक ख़ास तरह का शहरी मध्यवर्ग, अंग्रेजी दां, अंग्रेजी परस्त शासक वर्ग उभरा था। ज़्यादातर विदेशों में पढ़े इन युवा नेताओं का समाज बोध अंग्रेज़ियत के गिर्द था। अन्ना के आंदोलन से फिर भारत का वह नौजवान सामने आया है जो अब तक सत्ता परिवर्तन में भागीदार बनता रहा है। देहाती-कस्बाई नौजवान। जेपी आंदोलन के बाद से यह पीढ़ी राजनीति में हाशिए पर थी। अब नौजवानों की इस पीढ़ी ने फिर से अन्ना के जरिए अपनी सक्रियता दिखलाई है। मंडल आंदोलन के बाद पहली बार।

स देश की जनता भ्रष्टाचार का हिसाब लेती है। इतिहास में हमने कई दफ़ा देखा है। चार सौ सांसदो के साथ एक परमप्रतापी प्रधानमंत्री हुए थे। भ्रष्टाचार का आरोप लगा। आंदोलन हुए। चुनाव में जनता ने हिसाब चुकाया। लालू यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। देखिए बिहार के चुनावों में उनकी क्या हालत हुई। मौजूदा सरकार चारों तरफ़ से भ्रष्टाचार से घिरी है। लोहा गर्म है। राजनीति में अब तक दर्शक दीर्घा में बैठे लोग पहली बार आंदोलन के लिए सड़क पर निकले हैं। केवल मोमबत्ती लेकर सड़क पर जाने से कुछ नहीं होगा। पोलिंग बूथ भी जाना होगा। इसके लिए कमर कसिए।

मूमन हर ज्वलंत मुद्दे पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से मुंह खोला तो कहा कि “अनशन ठीक नहीं है”, “संसदीय लोकतंत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती”। तो क्या गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को असंवैधानिक कहा जाए? प्रधानमंत्री यह भी कह गए कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है अजीब बात है। इस देश के प्रधानमंत्री के पास जन आंदोलनों को कुचलने के लिए लाठी है। पर भ्रष्टाचार से निपटने वाली छड़ी नहीं है।

तो प्रधानमंत्री जी, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आपके पास जादू की छड़ी भले न हो। लेकिन इस देश की सर्वशक्तिमान जनता के पास एक छड़ी है। जब वह छड़ी चलती है तो परमप्रतापी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चार सौ सीटें पाकर ताकतवर प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी को कुर्सी से उतार जनता पटरे पर बिठा देती है। आप तो कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और अभी सिर्फ़ शुरूआत है।

(हेमंत शर्मा इंडिया टीवी में न्यूज़ डायरेक्टर हैं)

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